अपनों से दूर फंसे लोग, किसी को इलाज की चिंता तो किसी को परिवार की

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नई दिल्ली:जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 खत्म होने के बाद से लगातार कर्फ्यू लगा है। यहां की इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं सस्पेंड हैं। जम्मू-कश्मीर से बाहर रह रहे लोगों का अपनों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। बकरीद पर परिवार के लोग अपनों से मिलने घर नहीं पहुंच पाए। यहां तक की लोगों का फोन से संपर्क न हो पाने से उन्हें अपनों की चिंता सता रही है। कोई इलाज कराने के लिए जम्मू-कश्मीर से बाहर निकला तो फंस गया तो कोई पढ़ाई के लिए निकला और घर नहीं लौट सका।

कैंसर का इलाज कराने आए, खत्म हुए रुपये

महाराष्ट्र के परेल स्थित टाटा मेमोरिया में इलाज करा रहीं बेगम का कुछ ऐसा ही हाल है। बारामूला की रहने वाली 58 वर्षीय बेगम कैंसर से जूझ रही हैं। वह 24 जुलाई को यहां भर्ती हुई थीं। उनके साथ उनकी 29 वर्षीय बेटी है। उसने बताया कि उनके पास रुपये खत्म हो गए हैं। घर वापस जाने या संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं है। उसने कहा, ‘मेरी मां आईसीयू में हैं। रोज लगभग बीस हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। मेरे पिता रुपयों का इंतजाम करने 3 अगस्त को श्रीनगर गए थे, लेकिन अगले दिन कर्फ्यू लग गया और वह रुपयों की व्यवस्था नहीं कर सके और वहीं फंस गए।’

वापस जम्मू-कश्मीर जाना चाहता है परिवार

बेगम की बेटी ने बताया कि हालांकि उसने सोशल मीडिया का सहारा लिया और घाटी के कुछ अधिकारियों ने मदद की। छह दिनों बाद उनके पिता से उनका संपर्क हो गया। उनकी एयर टिकट की व्यवस्था करके वह 9 अगस्त को वापस आ गए लेकिन उनके पास रुपये नहीं थे। उनकी मां को आईसीयू से जनरल वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया। अब यह परिवार वापस जम्मू-कश्मीर जाना चाहता है लेकिन कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा।

बकरीद पर न जा सकी घर, नहीं आया खर्च भी

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में फिजिक्स से पीएचडी कर रही ओबिदा बीनिश इस बकरीद मायूस है। पहली बार है जब वह बकरीद पर अपने घर नहीं जा सकी है। अनंतनाग की रहने वाली ओबिदा का अपनों से संपर्क भी नहीं हो पा रहा है। उसकी अंतिम बार अपने घरवालों से 5 अगस्त को बात हुई थी। वह यहां नैनी में अकेली रह रही है। उसके साथ दस अन्य कश्मीरी छात्र यहां पढ़ रहे थे लेकिन वे सबी अगस्त के पहले हफ्ते ही अपने घरों के लिए चले गए थे। वह यहां अब अकेली बची है। उसने कहा कि उसके पिता महीने के पहले हफ्ते में रुपये भेजते थे लेकिन इस बार अभी तक उसका महीने का खर्चा भी नहीं आया है। वह बहुत परेशान है।

‘एक बार सुनना चाहता हूं बीमार मां की आवाज’

तीन साल पहले बडगाम से दून में पढ़ने आए तारिक अहमद भट्ट (22)अपनों के पास जाने के लिए परेशान हैं। उसने कहा, ‘ईद की शॉपिंग भूल गया मैं सिर्फ अल्लाह से यह मांग रहा हूं कि एक बार मुझे मेरी बीमार मां की आवाज सुनने को मिल जाए। बीते नौ दिनों से मैंने अपनों की आवाज नहीं सुनी है। वह किसी भी तरह अपने घर जाना चाहता है। वहीं एक दूसरे छात्र कुपवाड़ा के रहने वाले 21 वर्षीय साकिब असदुल्लाह की चचेरी बहन की शादी 19 अगस्त को होनी है लेकिन वह इस शादी में शामिल नहीं हो सकेगा।

श्रीनगर के लिए निकले थे भाई पर नहीं पता कहां हैं

चंडीगढ़ से श्रीनगर के लिए पिछले हफ्ते निकले रईस अतहर और गुलजार अहमद के भाई अभी तक अपने घर पहुंचे या नहीं इस बात को लेकर वे चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो सेटेलाइट नंबर दिए थे वह भी काम नहीं कर रहे हैं। हेल्पलाइन नंबरों से भी संपर्क नहीं हो पा रहा है। उनके भाई कहां हैं वे नहीं जानते।